Monday, July 6, 2020

महाजनपद और मगध साम्राज्य

महाजनपद और मगध साम्राज्य

  • ईसा पूर्व छठी सदी से पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे का व्यापक प्रयोग होने से बड़े-बड़े प्रादेशिक या जनपद राज्यों के निर्माण के लिए उपयुक्त परिस्थिति बन गई।
  • लोहे के हथियारों के कारण योद्धा वर्ग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगे।
  • खेती के नए औजारों और उपकरणों से किसान अपनी आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगे। अब राजा अपने सैनिक और प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए इस अतिरिक्त अनाज को एकत्रित करवा सकता था।
  • शहरों को अपने कार्यकलाप का आधार बनाकर राज्यों को खड़ा होते देख लोगों में जनपद भावना प्रबल हुई। लोगों की जो प्रबल निष्ठा अपने जन या कबीले के प्रति थी, वह अब अपने जनपद या स्वसम्बद्ध भूभाग के प्रति हो गई।


महाजनपद

  • बुद्ध के समय में हम 16 बड़े-बड़े राज्य पाते हैं, जो महाजनपद कहलाते थे। इनमें अधिकतर राज्य विंध्य के उत्तर में थे और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से बिहार तक फैले हुए थे।
  • साहित्यिक स्रोतों में जिन 16 महाजनपदों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं - अंग, मगध, काशी, वत्स, कोसल, शूरसेन, पांचाल, कुरु, मत्स्य, चेदि, अवंति, गंधार, काम्बोज, अश्मक, वज्जि और मल्ल।
  • इनमें मगध, कोसल, वत्स और अवन्ति ये चार शायद अधिक शक्तिशाली थे। अधिकांश जनपदों के विकास में तीन रूप दिखाई पड़ते हैं -

(i) कुछ जनों या कबीलों ने अकेले ही जनपद की अवस्था प्राप्त कर ली। मत्स्य, चेदि, काशी, कोसल तथा कुछ अन्य जन इस श्रेणी में आते हैं।
 (ii) कुछ जनों में पहले संयोग हुआ और उसके पश्चात् उसका जनपद के रूप में विकास हुआ। इस प्रकार का उदाहरण पांचाल जनपद है, जिसमें पांच जनों का संयोग था।
 (iii) अनेक जन अधिक शक्तिशाली जनों के द्वारा विजितहोने के बाद, उन्हीं में मिला लिए गए। अंग जन इस प्रकार का एक उदाहरण है।

 

  • अंततः मगध राज्य सबसे शक्तिशाली बन गया और एक साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुआ।
  • पालि साहित्य में मगध, उसके निवासियों और उसकी राजधानी गिरिव्रज (राजगीर) के संबंध में विस्तृत-वृतांत मिलता है। मगध में आधुनिक पटना और गया जिला तथा शाहाबाद का कुछ हिस्सा पड़ता है।


मगध की सफलता के कारण

  • मगध के चारों ओर प्राकृतिक सुरक्षा के साधन थे और निकटवर्ती जंगलों में पाई जानेवाली गजसेना से उसे पर्याप्त बल मिला।
  • मगध के आस-पास पाई गई लोहे की खानों से भांति-भांति के अó-शó बनाकर आर्य जाति को जंगलों को साफ करने में सहायता मिली और नए उद्योग-धंधों को बढ़ावा मिला।
  • मगध राज्य मध्य गंगा मैदान में पड़ता था और इस परम उर्वर प्रदेश में जंगलांे के साफ हो जाने के बाद यहां के किसान काफी अनाज पैदा कर लेते थे, और शासक कर के रूप में इस अतिरिक्त उपज को एकत्र करते थे।
  • गंगा नदी के पास होने के कारण व्यापारिक सुविधाएं बढ़ीं और आर्थिक दृष्टि से मगध का महत्व बहुत बढ़ गया। शासक अब वाणिज्य वस्तुओं पर चुंगी लगा सकते थे, और इस प्रकार अपनी सेना के खर्च के लिए धन एकत्र कर सकते थे।

मगध साम्राज्य के शासक
बिंबिसार (544-492 ई. पू.) : महावंश के अनुसार बिंबिसार 15 वर्ष की आयु में मगध नरेश बना। उसने गिरिव्रज (राजगृह) को अपनी राजधानी बनाकर हर्यंक वंश की नींव डाली। उसने पड़ोसी राज-परिवार की राजकुमारियों से वैवाहिक संबंध जोड़े। मगध के दक्षिण-पूर्व में अंग राज्य था जिसकी राजधानी आधुनिक भागलपुर के पास थी। बिंबिसार ने अंग राज्य को जीत लिया। अंग राज्य में गंगा के तट पर चंपा एक प्रसिद्ध बंदरगाह था, जहां से जहाज गंगा के मुहाने तक और आगे पूर्वी समुद्रतट के साथ-साथ दक्षिण भारत को जाते थे। दक्षिण भारत से ये जहाज मसाले और मणि-माणिक्य लेकर लौटते थे जिनसे मगध धनवान बन गया था।
 उसने मगध पर अच्छा शासन किया। उसकी मदद के लिए सलाहकारों की एक समिति थी। उसने गांवों के मुखिया को सीधे खुद से मिलने की अनुमति दे रखी थी, क्योंकि वह जानना चाहता था कि उसकी प्रजा क्या चाहती थी। वह दोषी पाए जाने पर पदाधिकारियों को भी दंडित करता था। उसने विभिन्न शहरों और गांवों को आपस में जोड़ने के लिए सड़कें बनवाईं और नदियों पर पुल बनवाए। राज्य की दशा स्वयं जानने के लिए उसने अपने सारे राज्य के दौरे किए। वह दूसरे राज्यों के साथ (अंग को छोड़कर) मित्रतापूर्ण संबंध बनाए रखना चाहता था। उसने सुदूर देशों को, यहां तक कि पश्चिमोत्तर भारत के गांधार राज्य को भी, अपने राजदूत भेजे थे।

स्मरणीय तथ्य
  • बौद्ध अनुयायियों की दृष्टि में त्रिपिटक सर्वाधिक पवित्र धर्मग्रंथ है।
  • बौद्ध सम्प्रदायों का कालक्रम है - स्थविरवादिन, सर्वास्तिवादिन, महायान और वज्रयान।
  • 'दीर्घ निकाय’ ग्रंथ में 25 मुख्य शिल्पों की चर्चा है। इसके महासुदस्सन सुत्त में चक्रवर्ती शासक का भव्य प्रसाद वर्णित है, जो 84,000 स्तम्भों तथा अन्य अनेक उपांगों से सुसज्जित कहा गया है। इस ग्रंथ के महापरिनिर्वाण सुत्त में पाटलिपुत्र नगर की निर्माण-योजना वर्णित है।
  • प्राक्-मौर्य काल में राजगृह मगध की राजधानी थी। यह नगर पांच पहाड़ियों के बीच स्थित था। जैन ग्रंथ ‘विविधि तीर्थकल्प’ में इन पहाड़ियों के नाम इस प्रकार दिए हैं - (i) विपुल गिरि (उत्तर), (ii) रत्नगिरि (पूर्व), (iii) उदयगिरि (दक्षिण-पूर्व), (iv)सोनगिरि (दक्षिण-पश्चिम),(v) वैभारगिरि (पश्चिम)।
  • बौद्ध साहित्य में महागोविन्द नामक कुशल शिल्पी का उल्लेख मिलता है जिसने ई. पूर्व पांचवीं शताब्दी में राजगृह आदि अनेक बड़े नगरों की निर्माण योजना प्रस्तुत की।
  • बौद्ध साहित्य में ‘स्तूप’ का प्रयोग मृत व्यक्ति की अस्थियों पर बनाई जाने वाली समाधि के लिए हुआ है, जिसका आकार आ®धे कटोरेनुमा टीले जैसा हो। बाद में ‘स्तूप’ शब्द उन स्मारकों के लिए भी प्रयुक्त होने लगा जो बुद्ध या उनके उपासकों की स्मृति या किसी घटना-विशेष की स्मृति हेतु बना दिए जाते थे।

अजातशत्रु (492-460 ई.पू.) : बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बिंबिसार की मृत्यु अपने महत्वाकांक्षी पुत्र अजातशत्रु के हाथों हुई, परंतु जैन साहित्य में अजातशत्रु को पितृ-हत्या का दोषी नहीं ठहराया गया है। अजातशत्रु ने आरम्भ से ही विस्तार की नीति अपनाई। बिंबिसार के प्रति अजातशत्रु के व्यवहार से क्षुब्ध होकर उसके मामा कोशलराज प्रसेनजित ने काशी को मगध से वापस ले लिया। अजातशत्रु का कोसल से युद्ध हुआ। पहले तो प्रसेनजित की हार हुई किंतु कुछ समय बाद दोनों में संधि हो गई और अजातशत्रु को न केवल काशी का प्रदेश मिला, अपितु कोसल की राजकुमारी वाजिरा का हाथ भी। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र के अनुसार अजातशत्रु का वज्जि संघ के साथ भी युद्ध हुआ। मगध सम्राट ने अपने कूटनीतिज्ञ मंत्री वत्सकार की सहायता से लिच्छवियों की शक्ति पर विजय पाई।

उदयन (460-444 ई. पू.) : उसने पटना में गंगा और सोनके संगम पर एक किला बनवाया। उदयन के बाद अनिरूद्ध, मुण्ड तथा दर्शक सिंहासन पर आए। महावंश नामक श्रीलंका के बौद्धों के इतिहास से ज्ञात होता है कि उनमें से प्रत्येक अपने-अपने पिता की हत्या करके सिंहासन पर बैठा था। सम्भवतः जनता ने 413 ई. पू. में अंतिम राजा को पदच्युत कर बनारस के उपराजा शिशुनाग को सिंहासन पर बिठाया।

शिशुनाग वंश (413-362 ई. पू.) : पुराणों के अनुसार शिशुनाग ने प्रद्योत वंश की सेना को नष्ट कर दिया। अवंति मगध साम्राज्य का भाग बन गया। इसी समय वत्स तथा कोसल पर भी शिशुनाग ने विजय पाई और इन राज्यों की विजय से मगध का बहुत विस्तार हो गया। कुछ समय के लिए राजधानी वैशाली ले आई गई।

नंद वंशः मगध का राज्य अब नंद वंश के हाथ में आ गया। इस वंश की स्थापना महानंदिन ने की, परंतु महापद नंद ने शीघ्र ही उसका वध कर दिया। वह एक शूद्र दासीपुत्र था। पुराणों में उसे सर्वक्षतांतक कहा गया है। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार महापद नंद के आठ पुत्र थे जिनमें से केवल अंतिम पुत्र धननंद के विषय में थोड़ी जानकारी मिलती है। धननंद उस समय मगध पर राज्य कर रहा था, जब भारत पर सिकंदर का आक्रमण हुआ। चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से मगध पर आक्रमण किया और धननंद को मारकर राजसिंहासन प्राप्त कर लिया।

Sunday, July 5, 2020

बौद्ध तथा जैन धर्म -2

जैन धर्म, शिक्षायें और सभायें

 

जैन धर्म

  • जैन श्रुतियोंके अनुसार, जैन धर्म की उत्पत्ति एवं विकास के लिये 24 तीर्थंकर उत्तरदायी थे। इनमें से पहले बाईस की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। परन्तु अन्तिम दो तीर्थंकर पाश्र्वनाथ और महावीर की ऐतिहासिकता को बौद्ध ग्रंथोंने प्रमाणित किया है।


पाश्र्वनाथ

  • जैन श्रुतियों के अनुसार तेइसवें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ बनारस के राजा अश्वसेन एवं रानी वामा के पुत्र थे। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में सिंहासन का परित्याग कर दिया और संन्यासी हो गए। 84 दिन की तपस्या के उपरांत उनको ज्ञान की प्राप्ति हुई।
  • उनकी मृत्यु महावीर से लगभग 250 वर्ष पहले सौ वर्ष की आयु में हुई।
  • पाश्र्वनाथ ”पदार्थ“ की अनन्तता में विश्वास करते थे। वह अपने पीछे अपने समर्थकों की काफी बड़ी संख्या छोड़ गए। पाश्र्वनाथ के शिष्य सफेद वस्त्रोंको धारण करते थे।


महावीर

  • चैबीसवें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर थे। उनका जन्म कुण्डग्राम (बासूकुण्ड), वैशाली के पास (बिहार) 540 ई. पू. में क्षत्रिय परिवार में हुआ था।
  • उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञात्रिक क्षत्रिय गण के मुखिया थे। उनकी माता लिच्छवि राजकुमारी थी, जिसका नाम त्रिशला था।
  • वर्द्धमान ने अच्छी शिक्षा प्राप्त की और उनका विवाह यशोदा के साथ हुआ। उससे उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम अनोज्जा प्रियदर्शिनी था।
  • 30 वर्ष की आयु में महावीर ने अपने घर का परित्याग किया और वह संन्यासी हो गये।
  • पहले उन्होंने एक वस्त्र धारण किया और फिर उसका भी तेरह मास के उपरान्त परित्याग कर दिया तथा बाद में वे ”नग्न भिक्षु“ की भांति भ्रमण करने लगे। घोर तपस्या करते हुए 12 वर्ष तक एक संन्यासी का जीवन व्यतीत किया।
  • अपनी तपस्या के 13वेंवर्ष में , 42 वर्ष की आयु में , उनको ”सर्वोच्च ज्ञान“ (कैवल्य) की प्राप्ति हुई।
  • बाद में उनकी प्रसिद्धि ”महावीर“ (सर्वोच्च योद्धा) या ”जिन“ (विजयी) के नामोंसे हुई। उनको ”निग्र्रंथ“ (बन्धनों से मुक्त) के नाम से भी जाना जाता था।
  • अगले 30 वर्षों तक वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहे और कोसल, मगध तथा अन्य पूर्वी क्षेत्रोंमें अपने विचारोंका प्रचार किया। वह एक वर्ष में आठ माह विचरण करते थे और वर्षा ऋतु के चार माह पूर्वी भारत के किसी प्रसिद्ध नगर में व्यतीत करते।
  • वह अक्सर बिम्बिसार तथा अजातशत्रु के दरबारोंमें भी जाते थे।
  • उनकी मृत्यु 72 वर्ष की आयु में पटना के समीप पावा नामक स्थान पर 468 ई. पू. में हुई।


महावीर की शिक्षायें

  •  महावीर ने पाश्र्वनाथ द्वारा प्रतिपादित किए गए धार्मिक विचारोंको ही अधिकतर स्वीकार किया तथापि उन्होंने कुछ संशोधन भी किया।
  • पाश्र्वनाथ ने निम्नलिखित चार सिद्धांतोंका प्रचार किया था:
    • सत्य
    • अहिंसा
    • किसी प्रकार की कोई सम्पत्ति न रखना
    • गिरी हुई या पड़ी हुई सम्पत्ति को ग्रहण न करना।
  • इसी में महावीर ने ”ब्रह्मचर्य व्रत का पालन“ करना भी जोड़ दिया।
  • महावीर का विश्वास था कि आत्मा (जीव) व पदार्थ (अजीव) अस्तित्व के दो मूलभूत तत्त्व हैं। उनके अनुसार, पूर्व जन्मोंकी इच्छाओंके कारण आत्मा दासत्व की स्थिति में है। लगातार प्रयासोंके माध्यम से आत्मा की मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। यही आत्मा की अन्तिम मुक्ति या मोक्ष है। यह मुक्त आत्मा ”पवित्र आत्मा“ हो जाती है।
  • जैन धर्म के अनुसार, मानव अपने भाग्य का स्वयं रचयिता है और वह पवित्र, सदाचारी एवं आत्म-त्यागी जीवन का अनुसरण करके ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। निम्नलिखित तीन सिद्धान्तों(तीन गुणव्रत या त्रिरत्न) का अनुसरण करके मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त किया जा सकता हैः

 (i) सम्यक् दर्शन,
  (ii) सम्यक् ज्ञान, और
  (iii) सम्यक् आचरण

 

  • ”निर्वाण“ या आध्यात्मिकता की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त करने के लिए उन्होंने घोर वैराग्य और कठोर तपस्या पर जोर दिया।
  • उनका विश्वास था कि सृष्टि की रचना किसी सर्वोच्च शक्ति के द्वारा नहीं की गयी। उत्थान-पतन के अनादि नियम के अनुसार सृष्टि कार्य करती है।
  • उनका विचार था कि सभी चेतन या अचेतन वस्तुओं में आत्मा का वास है। उनका किसी भी प्रकार से अपकार करने पर वे दुःख महसूस करते हैं।
  • उन्होंने वेदोंके प्रभुत्व का तिरस्कार किया और वैदिक अनुष्ठानोंतथा ब्राह्मणोंकी सर्वोच्चता का भी विरोध किया।
  • गृहस्थोें एवं भिक्षुओं, दोनोंके लिए आचार-संहिता को अनुसरणीय बताया। बुरे कर्मों से बचने के लिए एक गृहस्थ को निम्नलिखित पांच व्रतोंका पालन करना चाहिए:

 (i) परोपकारी होना,
  (ii) चोरी न करना,
  (iii) व्यभिचार से बचना,
  (iv) सत्य वचन और
  (v) आवश्यकता से अधिक धन-संग्रह न करना।

 

  • उन्होंने यह भी निर्देशित किया कि प्रत्येक गृहस्थ को जरूरतमंदों को प्रत्येक दिन पका हुआ भोजन खिलाना चाहिए।
  • उन्होंने प्रचारित किया कि छोटे पुजारियोंको कृषि कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इस कार्य में पेड़-पौधे एवं जन्तुओं का अन्त होता है।
  • जैन धर्म का विश्वास था कि मोक्ष प्राप्ति के लिए एक भिक्षु का जीवन अनिवार्य था और एक गृहस्थ इसको प्राप्त नहीं कर सकता था।
  • जैन दर्शन के अनुसार ज्ञान केवल सापेक्ष गुण है। इसे सप्तभंगीमय, स्याद्वाद तथा अनेकांतवाद भी कहते हैं।


जैन धर्म का विस्तार

  • महावीर के 11 शिष्य थे जिनको गन्धर्व या सम्प्रदायों का प्रमुख कहा जाता था।
  • आर्य सुधर्मन अकेला ऐसा गन्धर्व था जो महावीर की मृत्यु के पश्चात् भी जीवित रहा और जो जैन धर्म का प्रथम ”थेरा“  या मुख्य उपदेशक हुआ। उसकी मृत्यु महावीर की मृत्यु के 20 वर्ष पश्चात् हुई।
  • राजा नन्द के काल में जैन धर्म के संचालन का कार्य दो ”थेरों“ (आचार्यों) द्वारा किया जाता था:

(i) सम्भूतविजय और
 (ii) भद्रबाहु

 

  • छठे थेरा (आचार्य) भद्रबाहु, मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के समकालीन थे।
  • जैन अनुश्रुतियोंके अनुसार, अजातशत्रु का उत्तराधिकारी, उदयन, जैन धर्म का अनुयायी था।
  • सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय जैन भिक्षुओं को सिन्धु नदी के किनारे भी पाया गया था।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायी था और उसने भद्रबाहु के साथ दक्षिण की ओर प्रवास किया तथा जैन धर्म का प्रचार किया।
  • पहली सदी ई. में मथुरा एवं उज्जैन जैन धर्म के प्रधान केन्द्र बन गए।
  • इसकी सफलता का एक मुख्य कारण था कि महावीर एवं उसके अनुयायियों ने संस्कृत के स्थान पर लोकप्रिय भाषा (प्रान्त, धार्मिक साहित्य को अर्ध-मगधी में लिखा गया) का प्रयोग किया।

स्मरणीय तथ्य
 ऋषभ्    -    जैन धर्म की परम्पराओं के अनुसार ये प्रथम तीर्थंकर थे। इनका प्रतीक चिह्न सांढ़ है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में इन्हें नारायण का अवतार माना गया है।

 

आदिनाथ  -  ये द्वितीय तीर्थंकर थे। इनका प्रतीक चिह्न हाथी है।
 

पाश्र्वनाथ  -  ये तेइसवें तीर्थंकर थे। इनका प्रतीक चिह्न सर्प है। इनके पिता अश्वसेन बनारस के राजा थे।
 

महावीर  -  ये चैबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे। इनका प्रतीक चिह्न सिंह है।
 

त्रिशला  -  महावीर की माता। ये बिम्बिसार के ससुर लिच्छवी नरेश चेटक की बहन थीं।
 

नंदिवर्धन  - महावीर के अग्रज।
 

त्रिरत्न -  सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण को जैन धर्म का त्रिरत्न माना जाता है जिसके अनुसरण से आत्मा जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होकर विशुद्ध, आनन्दमय आवास (सिद्धशिला) को प्राप्त कर सकती है।
 

श्वेताम्बर -  सफेद वस्त्र धारण करने वाले और स्थूलबाहुभद्र के अनुयायी।
 दिगंबर  -  नग्न रहने वाले और भद्रबाहु के अनुयायी।

जैन सभायें

  • चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन की करीब के समीप दक्षिण बिहार मेंभयंकर अकाल पड़ा। यह 12 वर्षों तक रहा। भद्रबाहु और उनके शिष्योंने कर्नाटक राज्य में श्रवण बेलगोला की ओर विस्थापन किया। अन्य जैन मुनि स्थूलबाहुभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रह गये। उन्होंने पाटलिपुत्र में 300 ई. पू. के आस-पास सभा का आयोजन किया। इस सभा में महावीर की पवित्र शिक्षाओं को 12 अंगों में विभाजित किया गया।
  • दूसरी जैन सभा का आयोजन 512 ई. मेंगुजरात में वल्लभी नामक स्थान पर देवर्धिगणि क्षमा-श्रमण की अध्यक्षता में किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य धार्मिक शास्त्रों को एकत्र एवं उनको क्रमिक रूप से संकलित करना था। किन्तु प्रथम सभा में संकलित बारहवां अंग इस समय खो गया था। शेष बचे हुए अंगों को अर्धमागधी मेंलिखा गया।
बुद्ध से संबंधित प्रतीक चिह्न
जन्म             

कमल और सांढ़

महाभिनिष्क्रमण (गृहत्याग) घोड़ा
निर्वाण बोधि वृक्ष
प्रथम उपदेश धर्मचक्र या चक्र
महापरिनिर्वाण (मृत्यु) स्तूप

संप्रदाय

  • श्रवणबेलगोला से मगध वापस लौटने के बाद भद्रबाहु के अनुयायियों ने इस निर्णय को मानने से इन्कार कर दिया कि 14 पर्व खो गये थे।
  • मगध में ठहरने वाले सफेद वस्त्रों को धारण करने के अभ्यस्त हो चुके थे और वे महावीर की शिक्षाओं से दूर होने लगे जबकि पहले वाले नग्न अवस्था में रहते और कठोरता से महावीर की शिक्षाओं का अनुसरण करते।
  • जैन धर्म का प्रथम विभाजन दिगम्बर (नग्न रहने वाला ) और श्वेताम्बर (सफेद वस्त्र धारण करने वालों) के बीच हुआ।
  • अगली शताब्दियों में पुनः दोनों सम्प्रदायों में कई विभाजन हुए। इनमें महत्वपूर्ण वह सम्प्रदाय था जिसने मूर्ति-पूजा को त्याग दिया और ग्रंथों की पूजा करने लगे। वे श्वेताम्बर सम्प्रदाय में तेरापन्थी कहलाये और दिगम्बर सम्प्रदाय में समयास कहलाये। यह सम्प्रदाय छठी ईसवी में अस्तित्व में आया।


जैन साहित्य

  • श्वेतांबर ग्रंथों से मालूम होता है कि महावीर ने जो उपदेश दिया था, उसे उनके दो प्रधान शिष्य, इंद्रभूति और सुधर्मा ने, जो गणधर कहलाते थे, व्यवस्थित रूप में संकलित किया और वह समुच्चय संकलन द्वादशांगी कहलाया, अर्थात् उनकी समस्त वाणी वर्गीकृत करके बारह अंगों में विभक्त की गई।
  • स्थूलभद्र को द्वादशांगी के लुप्त हो जाने का डर हुआ, इसलिए उन्होंने महावीर-निर्वाण के लगभग 160 वर्ष बाद पाटलीपुत्र में श्रमण-संघ की एक सभा बुलाई। उन सबके सहयोग से संप्रदाय के मान्य तत्वों का ग्यारह अंगों में संकलन किया गया। यह संग्रह पाटिलपुत्र-वाचना कहलाता है। बारहवें अंग दिट्ठवाय (दृष्टिवाद) के 14 भागों में से, जो कि पुव्व या पूर्व कहलाते थे, अंतिम चार पूर्व नष्ट हो चुके थे, अर्थात् उन्हें भी शिष्य प्रायः भूल गए थे। फिर भी जो कुछ याद था, उसका संग्रह कर लिया गया।
  • दिगंबरों ने पाटलीपुत्र की सभा द्वारा संगृहीत अंगों और पूर्वों को अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि असली अंग-पूर्व लुप्त हो चुके थे।
  • महावीर-निर्वाण की छठी शताब्दी में आर्य स्कंदिल के आधिपत्य में फिर एक सभा बुलाई गई और श्वेतांबरों के पूर्वोक्त संकलन को सुव्यवस्थित किया गया। इस उद्धार को माथुरी-वाचना कहते हैं।
  • महावीर-निर्वाण की दसवीं शताब्दी के लगभग (सन् ईसवी की छठी शताब्दी) वल्लध्भी-नगरी (काठियावाड़) में एक और सभा की गई, जिसके अध्यक्ष देवर्धिगणि क्षमाश्रमण हुए जाउन दिनों संप्रदाय के गणधर या नेता थे। इस सभा में फिर से ग्यारह अंगों का संकलन हुआ। इस समय जो ग्यारह अंग उपलब्ध हैं, वे देवर्धिगणि के संकलन किए हुए माने जाते हैं।
स्मरणीय तथ्य
  • 600 ई. पू. से 300 ई. पू. के बीच प्रचलित पंचमार्क सिक्कों पर पहाड़, वृक्ष, मछली आदि के चिन्ह प्राप्त होते हैं।
  • गौतमी प्रथम बौद्ध भिक्षुणी थी।
  • चतुर्थ बौद्ध महासंगीति में संस्कृत को धर्म प्रचार का मुख्य माध्यम घोषित किया गया।
  • आजीवक सम्प्रदाय अशोक वृक्ष की देवता की तरह पूजा करता था तथा अपने हाथ में मोर-पंख लेकर विचरण करता था।
  • महात्मा बुद्ध के जन्म, निर्वाण और महापरिनिर्वाण की घटनाएं बैसाख पूर्णिया को घटित हुई थीं।
  • जैन धर्म के अहिंसा तथा शांति के संदेश में व्यापार और वाणिज्य की उन्नति की संभावना निहित थी जिसके कारण व्यापारी वर्ग जैन धर्म की ओर आकृष्ट हुआ।
  • छठी शताब्दी ई. पू. में आजीवक सम्प्रदाय का जन्म हुआ जिसने कर्म के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया। उसके अनुसार मनुष्य प्राकृतिक नियमों के अधीन सुख-दुःख भोगता है।
  • आजीवक सम्प्रदाय के प्रमुख धार्मिक नेता मस्करी गोसाल थे।
  • वैशेषिक दर्शन का विकास अणुवाद से हुआ। इसके प्रमुख प्रवर्तक पकुध कात्यायन थे।
  • बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं - बुद्ध, धम्म और संघ।
  • जैन धर्म के त्रिरत्न हैं - सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण।

 

  • संपूर्ण जैनागम छः भागों में विभक्त है -

(i) बारह अंग
(ii) बारह उवंग या उपांग
(iii) दस पइण्णा या प्रकीर्णक
(iv) छः छेयसुत्त या छेदसूत्र
(v) दो सूत्र-ग्रंथ
(vi) चार मूल सुत्त या मूल सूत्र

  • ये सभी ग्रंथ आर्ष या अर्ध-मागधी प्राकृत में लिखे हुए हैं। कुछ आचार्यों के मत से बारहवां अंग दृष्टिवाद संस्कृत में था। बाकी जैन साहित्य महाराष्ट्री प्राकृत, अपभ्रंश और संस्कृत में है।
  • दिगंबरों ने एक दूसरे ढंग से भी समस्त जैन साहित्य का वर्गीकरण करके उसे चार भागों में विभक्त किया है -

(i) प्रथमानुयोग, जिसमें पुराण-पुरुषों के चरित और कथाग्रंथ हैं।
(ii) करणानुयोग, जिसमें भूगोल-खगोल, चारों गतियों और काल विभाग का वर्णन है।
(iii) द्रव्यानुयोग, जिसमें जीव-अजीव आदि तत्वों का, पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष का वर्णन है।
(iv) चरणानुयोग, जिसमें मुनियों और श्रावकों के आचार का वर्णन है।

  • जैन पुराणों के मूल प्रतिपाद्य विषय 63 महापुरुषों के चरित्र हैं। इनमें 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9 वासुदेव और 9 प्रतिवासुदेव हैं। इन चरित्रों के आधार पर लिखे गए ग्रंथों को दिगंबर लोग साधारणतः पुराण कहते हैं और श्वेतांबर लोग चरित।

Saturday, July 4, 2020

बौद्ध तथा जैन धर्म -1

बौद्ध धर्म और बौद्ध साहित्य

 बौद्ध धर्म

  • बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध महावीर के समकालीन थे। इनका जन्म 563 ई. पू. में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी ग्राम के आम्र-कुंज में हुआ था।
  • इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।
  • ये उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में रूम्मिनदेई के निकट कपिलवस्तु के शाक्य क्षत्रिय कुल के थे।
  • जन्म के सातवें दिन उनकी माता का देहावसान हो गया और उनका लालन-पोषण उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया।
  • इनकी माता का नाम महामाया था जो कोशल राजवंश की कन्या थी।
  • इनके पिता का नाम शुद्धोधन था जो संभवतः कपिलवस्तु के निर्वाचत राजा और गणतांत्रिक शाक्यों के प्रधान थे। गौतम बुद्ध की पत्नी का नाम यशोधरा था।
  • 29 वर्ष की उम्र में वे महावीर की तरह घर से निकल पड़े। सात वर्षों तक भटकते रहने के बाद 35 वर्ष की उम्र में बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। तब से वे बुद्ध अर्थात् प्रज्ञावान कहलाने लगे।
  • इसके बाद बुद्ध ने बनारस के नजदीक सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया जिसे धर्म-चक्र प्रवर्तन कहते हैं। इसके बाद बुद्ध ने आजीवन अपने उपदेशों का प्रचार किया।
  • 80 वर्ष की उम्र में 483 ई. पू. में पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक स्थान पर उनकी मृत्यु हो गई। इसे महापरिनिर्वाण कहते हैं।


बौद्ध धर्म के सिद्धांत

  • बौद्ध धर्म के मूलाधार चार आर्य सत्य हैं। ये हैं - दुःख, दुख समुदाय, दुःख निरोध तथा दुःख निरोध-गामिनी-प्रतिपदा (दुःख निवारक मार्ग) अर्थात् अष्टांगिक मार्ग।
  • ये आठ मार्ग हैं - सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इस अष्टांगिक मार्ग के अनुशीलन से व्यक्ति निर्वारण की ओर अग्रसर होता है।
  • बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग के अंतर्गत अधिक सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करना या अत्यधिक काया-क्लेश में संलग्न होना, दोनों को वर्जित किया है। उन्होंने इस संबंध में मध्यम प्रतिपदा (मार्ग) का उपदेश दिया है।
  • जैन तीर्थंकरों की तरह बुद्ध ने भी अपने अनुयायियों के लिए आचार-संहिता बनाए। इसके मुख्य नियम हैं - (i) पराये धन का लोभ नहीं करना, (ii) हिंसा नहीं करना, (iii) नशा का सेवन न करना और (iv) दुराचार से दूर रहना।

वशिष्टताएं एवं प्रसार के कारण

  • बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता। इस बात को हम भारतीय धर्मों के इतिहास में एक क्रांति कह सकते हैं।
  • बौद्ध धर्म वैदिक क्षेत्र के बाहर के लोगों को अधिक भाया और वे लोग सुविधापूर्वक इस धर्म में दीक्षित हुए।
  • मगध के निवासी इसकी ओर तुरंत उन्मुख हुए, क्योंकि कट्टर ब्राह्मण उन्हें नीच मानते थे और मगध आर्यों की पुण्य-भूमि आर्यावत्र्त की सीमा के बाहर पड़ता था।
  • आम लोगों की भाषा पालि को अपनाने से भी इसके प्रचार को बल मिला।
  • गौतम बुद्ध ने एक संघ की स्थापना की, जिसमें हर व्यक्ति को बिना जाति या लिंग भेद के प्रवेश दिया जाता था।
  • बुद्ध के निर्वाण के दौ सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाया। यह बौद्ध धर्म के इतिहास में युग-प्रवर्तक घटना सिद्ध हुई। अशोक ने अपने धर्मदूतों के द्वारा इस धर्म को मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया और श्रीलंका में फैलाया और इसे एक विश्व धर्म बना दिया।


ह्रास के कारण

  • ईसा की बारहवीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म भारत से लुप्त-सा हो गया। इसके मुख्य कारण थे - इसमें भी ब्राह्मण धर्म की वे बुराइयां घुस गईं जिनके विरुद्ध इसने आरम्भ में लड़ाई छेड़ी थी; कालांतर में यह उन्हीं कर्मकांडों और अनुष्ठानों के जाल में फंस गया जिनकी यह निन्दा करता था; बौद्ध धर्म की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सुधारा, पशुधन की रक्षा पर बल दिया तथा वक्तियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया।
  • दूसरी ओर बौद्ध धर्म में विकृतियां आती गईं। बौद्ध भिक्षु जनसामान्य की भाषा को छोड़ संस्कृत को अपनाने लगे। ईसा की पहली सदी से वे बड़ी मात्रा में प्रतिमा-पूजन करने लगे और उपासकोंसे खूब चढ़ावा लेने लगे।
  • सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध विहार विलासी लोगों के प्रभुत्व में आ गए और उन कुकर्मों के केन्द्र बन गए जिनका गौतम बुद्ध ने कड़ाई के साथ निषेध किया था।
  • अपनी अपार सम्पत्ति के कारण बुद्ध विहार हमलावरों के भी शिकार हुए। मोटे तौर पर बारहवीं सदी तक बौद्ध धर्म अपने जन्म-स्थल से करीब-करीब लुप्त हो चुका था।
स्मरणीय तथ्य
गौतम बुद्ध का गोत्र नाम
यशोधरा कोल्लिवंशीय कन्या व बुद्ध की पत्नी
चन्ना बुद्ध का सारथी
कंठक बुद्ध का प्रिय घोड़ा
महाभिनिष्क्रमण 29 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध द्वारा गृहत्याग
आलार कलाम गृहपरित्याग के पश्चात बुद्ध वैशाली के आलार कलाम के शिष्य बने। कलाम सांख्य दर्शन की शिक्षा देते थे। यहीं बुद्ध ने समाधि की सातवीं अवस्था को प्राप्त किया जिसे अकिंचनयत्न कहते हैं।
उद्रक रामपुत्र कलाम के पश्चात् बुद्ध ने राजगृह में उद्रक रामपुत्र को अपना गुरु माना।
निरंजना आधुनिक लिलाजन नदी जिसके तट पर बुद्ध ने 35 वर्ष की अवस्था में निर्वाण प्राप्त किया।
सुजाता निर्वाण प्राप्ति के बाद बुद्ध ने इस कन्या के हाथों भोजन ग्रहण किया।
मार कामदेव रूप जिसने बुद्ध की समाधि भंग करने की चेष्टा की।
बोधिवृक्ष इसके नीचे बैठकर बुद्ध ने ज्ञान-प्राप्ति की थी। गौड़ राजा शशांक ने इस वृक्ष को कटवा दिया।
धम्मचक्रप्रवर्तन बुद्ध द्वारा सारनाथ (इसिपत्तन) में पांच ब्राह्मण साथियों (जो राजगृह तपस्या के दौरान बुद्ध द्वारा अन्नग्रहण करने के पश्चात् उनसे विलग हो गए थे।) को दिया गया प्रथम उपदेश। सारनाथ में ही बुद्ध ने संघ की स्थापना की।
उपालि व आनन्द बुद्ध के प्रधान शिष्य।
चुन्द इसके द्वारा अर्पित भोजन (सुअर का मांस) ग्रहण करने के पश्चात् बुद्ध की मृत्यु हुई।
महापरिनिर्वाण बौद्ध साहित्यों में बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्वाण कहा गया है।



उपादेयता और प्रभाव

  • यों तो बौद्ध भिक्षु संसार से विरक्त रहते और बार-बार लोभी ब्राह्मणोंकी निन्दा करते थे, फिर भी कई मामलोंमें ब्राह्मणोंसे उनका साम्य था। दोनों ही उत्पादन-कार्य में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लेते थे और समाज से मिली भिक्षा या दान पर जीते थे।
  • बौद्ध धर्म ने वक्तियोंऔर शूद्रोंके लिए अपने द्वार खोलकर समाज पर गहरा प्रभाव जमाया।
  • ब्राह्मण धर्म ने वक्तियोंऔर शूद्रोंको एक ही दर्जे में रखा था और उन्हेंयज्ञोपवीत संस्कार या वेदाध्ययन की अनुमति नहीं थी। बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर उन्हेंइस हीनता से मुक्ति मिल गई।
  • इसने लोगोंको यह सुझाया कि किसी वस्तु को यों ही नहीं बल्कि भली-भांति गुणदोष का विवेचन कर ग्रहण करें। कुछ हद तक अंधविश्वास का स्थान तर्क ने ले लिया।
  • बौद्धों ने अपने लेखन से पालि को समृद्ध किया। बौद्ध विहार शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र बने।
  • भारत में पूजित पहली मानव प्रतिमाएं शायद बुद्ध की ही हैं। 
  • मध्य एशियाई सम्पर्क के कारण गंधार और मथुरा में बौद्ध कला फूली-फली।


बौद्ध साहित्य

  •  कहा जाता है कि प्रथम बौद्ध महासंगीति के दौरान उपालि ने विनय पिटक (यह बौद्ध संघ की नियमावली है) का पाठ किया, जो उसने बुद्ध से सुना था।
  • आनन्द ने इसी महासंगीति के दौरान सुत्त पिटक का गायन किया जो धर्मसिद्धान्त एवं नीतिविषयक मामलोंमें बुद्ध के उपदेशोंका महान संकलन है।
  • कहा जाता है कि अभिधम्म पिटक के कथावत्थु का संकलन तृतीय बौद्ध महासंगीति के दौरान हुआ।
  • चीनी परम्परा के अनुसार चौथे महासंगीति के दौरान सर्वास्तिवादिन सिद्धांतों का महाविभाषा के रूप में संकलन किया गया।
  • स्थाविरवादिनोंके पालि धर्मग्रंथोंको तीन वर्गों (पिटकों) में विभाजित किया जाता है - विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक।
  • विनय पिटक बौद्ध संघोंकी वह नियमावली है जिसे स्वयं बुद्ध द्वारा प्रतिपादित माना जाता है। प्रत्येक नियमोंके साथ उन परिस्थितियों का भी वर्णन है जिसके तहत ये नियम बनाए गए। विनय पिटक  में अपेक्षाकृत प्रारम्भिक परम्परागत विषयों का वर्णन है।
  • तीनों पिटकों में वृहतम् एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुत्त पिटक है। यह पांच निकायों(भागों) में विभक्त हैः

(i) दीर्घ निकाय, जो बुद्ध के दीर्घ उपदेशोंका संकलन है।
(ii) मज्झिम निकाय, जो लघु उपदेशों का संकलन है।
(iii) संयुत्त निकाय, जो सदृश विषयोंपर संक्षिप्त उद्धोषणाओं का संकलन है।
(iv) अंगुत्तर निकाय, जो 2000 से अधिक संक्षिप्त वक्तव्यों का संकलन है।
(v) खुद्दक निकाय: दिव्यावदान में प्रथम चार निकायों का ही उल्लेख मिलता है लेकिन यह सर्वास्तिवाद का ग्रंथ है। बुद्धघोष नामक प्रसिद्ध भाष्यकार ने सुदिन्न नामक एक भिक्षु का मत उद्धृत किया है, जिससे जान पड़ता है कि प्राचीन काल में कुछ ऐसे भिक्षुक थे, जो खुद्दक निकाय (क्षुद्रक निकाय) को सुत्त पिटक के अंतर्गत नहीं मानना चाहते थे। दो बौद्ध संप्रदायोंमें खुद्दक निकाय के ग्रंथोंकी दो प्रकार की सूची दी हुई है। एक मत के अनुसार इसकी संख्या 12 और दूसरे मत के अनुसार 15 है। अंतिम मत को ही प्रामाणिक समझकर बुद्धघोष ने पंद्रह ग्रंथोंकी सूची दी है, जिसमें धम्मपद, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक आदि उल्लेखनीय है।

बौद्ध महासंगीति
  • प्रथम महासंगीति (483 ई. पू.): यह संगीति सत्तपन्नि (राजगृह, बिहार) में अजातशत्रु के शासन काल में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता महाकश्यप उपालि ने की। इसमें बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों - विनय पिटक और सुत्त पिटक में संकलित किया गया।
  • द्वितीय महासंगीति (383 ई. पू.): इसका आयोजन वैशाली (बिहार) में कालाशोक के शासनकाल में हुआ। इसका नेतृत्व साबाकमी कालाशोक ने किया। वैशाली के भिक्षुक नियमों में ढिलाई चाहते थे। परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म स्थविरवादी व महासंघिक दो भागों में बंट गया।
  • तृतीय महासंगीति (250 ई. पू.): यह संगीति पाटलिपुत्र में अशोक के शासनकाल में संपन्न हुआ। इसकी अध्यक्षता मोगलीपुत्त तिस्स ने की। इसमें धर्म ग्रंथों का अंतिम रूप से सम्पादन किया गया तथा तीसरा पिटक अभिधम्म पिटक सम्मिलित किया गया।
  • चतुर्थ महासंगीति (प्रथम या द्वितीय ईसवी सदी): इसका आयोजन बसुमित्र और अश्वघोष के नेतृत्व में कश्मीर में कनिष्क के शासनकाल में हुआ। इसमें बौद्ध धर्म के दो सम्प्रदायों - महायान तथा हीनयान का उदय हुआ।
  • अभिधम्म पिटक बुद्ध के बहुत बाद संग्रह किए गए थे। सुत्त पिटक की प्रतिपाद्य वस्तु से कोई नवीनता इसमें नहीं है। दोनोंमें अंतर सिर्फ इतना है कि सुत्त पिटक सरल, सरस और सहज बौद्ध सिद्धांतोंका संग्रह है और अभिधम्म में पंडिताऊपन, रुक्षता और वर्गीकरण की अधिकता है। फिर भी बौद्ध-दर्शन, बौद्ध परिभाषा आदि के समझने में यह बहुत ही उपयोगी है।
  • पालि-ग्रंथों में कुल मिलाकर नौ बौद्ध महासंगीतियोंका उल्लेख है।
  • वैसे बौद्ध साहित्य जिनकी मूल रचना पालि में नहीं हुई, अनुपालि या अनुपिटक ग्रंथ कहलाते हैं। इनमें अधिकांश श्री लंका के भिक्षुओंद्वारा रचित हैं।
  • जो अनुपालि ग्रंथ श्री लंका में नहीं लिखे गए उनमें सबसे प्रसिद्ध मिलिंदपण्णहो या मिलिंदप्रश्न है। ग्रीक राजा मीनांडर और बौद्ध संन्यासी नागसेन के बीच जो तत्त्व चर्चा हुई थी, उसी का यह लिपिबद्ध रूप है।
  • दूसरा ग्रंथ जो भारतवर्ष में लिखा गया था, वह है नेत्तिप्रकरण जिसे नेत्तिगंध या नेत्ति भी कहते हैं। इसके कत्र्ता बुद्ध के शिष्य महाकच्चायन हैं जो पेटकोपदेश के भी रचयिता माने जाते हैं।
  • श्रीलंका में रचित अनुपिटक ग्रंथोंमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है बुद्धघोष की अट्ठकथाएँ (या भाष्य)।
  • श्रीलंका में जो नई चीज लिखी गईं, इनमें सबसे पहले निदान कथा का नाम लिया जाना चाहिए।
  • श्रीलंका में ही दो ऐतिहासिक काव्य दीपवंश और महावंश भी लिखे गए। दोनोंही काव्य पांचवीं शताब्दी की कृति माने जाते हैं।
  • मूल सर्वास्तिवादियोंके प्रसिद्ध ग्रंथों का चीनी यात्री इत्सिंग ने चीनी भाषा में अनुवाद किया था।
  • हीनयान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ महावस्तुअवदान (संक्षेप में महावस्तु) है। यह पुस्तक महासांधिक संप्रदाय की लोकोत्तरवादी शाखा का विनय पिटक है।
  • ललितविस्तर महायान संप्रदाय का ग्रंथ है। इसमें सभी महायानी लक्षण विद्यमान हैं, यद्यपि यह ग्रंथ मूल रूप से हीनयान संप्रदाय के सर्वास्तिवादियोंके लिए लिखा गया था।
  • अश्वघोष रचित बुद्धरचित और सौंदरानंद संस्कृत काव्य के भूषण माने जाते हैं।
  • महायानसूत्रोंमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ सद्धर्म-पुंडरीक है।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक महायानसूत्र हैं प्रज्ञापारमिताएं। जिस प्रकार प्रज्ञापारमिताएं शून्यवाद का प्रचार करती हैं, उसी प्रकार सद्धर्मलंकावतार-सूत्र विज्ञानवाद का।
  • माध्यमिक-कारिका और प्रज्ञापारमिता-कारिका नागार्जुन की प्रसिद्ध कृतियां हैं।


बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदाय
महायान: इसकी स्थापना नागर्जुन ने की थी। महायानी लोग बोधिसत्व, बोधिसत्व की मूर्ति तथा संस्कृत भाषा आदि के प्रयोग में विश्वास करते थे। उन्होंने बुद्ध  को अवतार मानकर उनकी मूर्ति बनाकर उपासना करना आरम्भ कर दिया। यह संप्रदाय तिब्बत, चीन, कोरिया, मंगोलिया और जापान में फैला। वसुमित्र, अश्वघोष, कनिष्क और नागार्जुन इसके प्रमुख प्रवत्र्तक थे।

हीनयान: जिन अनुयायियोंने बिना किसी परिवर्तन के बुद्ध के मूल उपदेशोंको स्वीकार किया, वे हीनयानी कहलाए। श्रीलंका, बर्मा, स्याम, जावा आदि देशोंमें इस सम्प्रदाय के लोग हैं।
वज्रयान: सातवीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म का एक नया रूप सामने आया, जिसे वज्रयान कहते हैं। इस सम्प्रदाय के अनुयायियोंने बुद्ध को अलौकिक सिद्धियोंवाला पुरुष माना। इसमें मंत्र, हठयोग और तांत्रिक आचारोंकी प्रधानता थी।

Monday, June 29, 2020

सिंधु घाटी की सभ्यता -3

मृत संस्कार, धर्म और कला 

मृत संस्कार

  • सिन्धु प्रदेश में मुख्यतः तीन तरह से मृतक संस्कार करने की प्रथा थी। - (a) मृतक के शरीर को ज्यों- का-त्यों पृथ्वी में गाड़ देना, (b) शव को खुला छोड़कर पशु-पक्षियों को खिलाने के बाद कंकाल भाग को पृथ्वी में गाड़ना, (c) शव का अग्नि संस्कार कर देना।
  • मेसोपोटामिया और मिस्र की तरह सिन्धु-सभ्यता में भी शवों के साथ जीवन की सभी आवश्यक वस्तुओं को गाड़ने की प्रथा थी। इससे स्पष्ट होता है कि सिन्धु सभ्यता के निवासी पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।
  • हड़प्पा में शवों को गाड़ने और मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा प्रचलित थी।
  • मोहनजोदड़ो में राख और हड्डियों से भरे बहुत से कलश मिले हैं।

स्मरणीय तथ्य

  • सिन्धुवासी रथ निर्माण की कला से परिचित नहीं थे।
  • गेहूं और जौ रबी फसल के रूप में उत्पादित की जाती थी।
  • सिन्धुवासियों का प्रमुख निर्यात सूती वस्त्र, मृृण्मूर्तियां और मिट्टी के बर्तन थे।
  • कबूतर सिन्धुवासियों के लिए पूजनीय था।
  • मृतक संस्कार की विभिन्न पद्धतियों में पूर्णरूपेण समाधिस्थ करना सर्वाधिक लोकप्रिय था।
  • कुछ विद्वानों ने हड़प्पा की अभिन्नता ‘हरि-यूपीया’ से सिद्ध करने की चेष्टा की है। ‘हरि-यूपीया’ का उल्लेख एक बार ऋग्वेद में हुआ है।
  • हड़प्पा संस्कृति के स्थलों से ऐसे भवनों के अवशेष प्राप्त नहीं हुए है जिन्हें निर्विवाद रूप से पूजा-गृह या मंदिर की संज्ञा दी जा सके।
  • सामान्यतः भवनों में अलंकरण का अभाव रहता था। हो सकता है कि कुछ भवनों को अलंकृत किया गया हो और अलंकरण के चिन्ह अब नष्ट हो गए हो।
  • नगरों में सड़कों तथा भवनों की स्थिति तथा उनकी सामान्य योजना लगभग एक-सी थी। उसमें तकनीकी कुशलता तथा वैज्ञानिकता के बावजूद विधिता का अभाव था।
  • भवनों के निर्माण में सामान्यतया पक्की ईंटों का ही प्रयोग किया गया। उनकी जुड़ाई मिट्टी के गारे से की जाती थी।
  • ऊँचे चबूतरों के निर्माण में तथा बाद के भवनों की दीवालों में सामान्यतया कुछ कच्ची ईंटों का प्रयोग भी किया जाता था।
  • हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में एक से अधिक मंजिल के भवनों के चिन्ह कम प्राप्त हुए है। पर ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश भवनों में एक से अधिक मंजिले थीं। इनमें से भूमितल पर बनी प्रथम मंजिल तो ईंटों की होती थी, किन्तु उनके ऊपर एक या उससे अधिक मंजिलों के निर्माण में लकड़ी का प्रयोग किया जाता था।
  • दरवाजों के ऊपर की पटाई अधिकांशतः लकड़ी के तख्तों या डण्डों की सहायता से की जाती थी। जहां किसी छोटे स्थान को पाटना होता वहां ईंटों का टोड़ेदार मेहराब बना दिया जाता था।

लिपि ज्ञान

  • सिन्धु सभ्यता के निवासियों ने लेखन कला का भी विकास किया था। उनकी लिपि चित्रात्मक थी, जिनमें प्रत्येक लिपि रेखीय संकेत किसी जीवित एवं अजीवित वस्तु को दर्शाती थी।
  • विद्वानों का विचार है कि साधारणतया इस लिपि की लिखावट दाहिनी से बाँयी ओर थी।
  • कुछ विद्वानों का मत है कि यह वही लिपि है जिसका प्रयोग मिस्र, मेसोपोटामिया तथा पश्चिम एशिया में होता था। किन्तु यह सर्वमान्य नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सिन्धु प्रदेश की लिपि है और पश्चिमी एशिया की लिपियों से इसका किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है।
  • सिन्धु लिपि में मुख्यतः 62 चिन्ह है।
  • इस लिपि का कम्प्यूटर विश्लेषण पूर्व सोवियत संघ में 1964 में और भारत के टाटा इन्स्टिट्यूट आॅफ फंडामेन्टल रिसर्च में 1972 में हुआ।

धर्म और कला

  • सिन्धु घाटी में किसी प्रकार का मंदिर या वेदी प्राप्त नहीं हुई है।
  • हड़प्पा एवं बलूचिस्तान के अधिकांश स्थानों से प्राप्त स्त्री एवं सांड़ की मूर्तियों, भव्य भवन की रचना एवं उससे सम्बन्धित नालियां, स्नानागार, एवं मुहरों पर प्राप्त आकृतियों से लोगों के धार्मिक विचारों का पता चलता है।
नव-पाषाण युग
  • इस युग के मनुष्यों ने सभ्यता के मामले में काफी प्रगति की। औजार बेहतर ढंग से तराशे, घिसे तथा चिकने किए हुए थे। 
  • प्रमुख उपकरण थे।सेल्ट, बसूले, छेनियां, मूसल, बाणाग्र, आरियां, तक्षणियां आदि। 
  • तीन तरह की विशेष कुल्हाड़ियां प्रयोग में लाई जाती थीं। ये थे।वक्र धार की तिकोनी कुल्हाड़ियां, पालिशदार पत्थर की कुल्हाड़ियां, नुकीले हत्थे व अंडाकार बगलों वाली कुल्हाड़ियां
  • इस युग के अवशेष तमिलनाडु, कर्नाटक, हैदराबाद, कश्मीर, बंगाल, उड़ीसा और नागपुर से प्राप्त हुए हैं।
  • कुछ नई खोजों के साथ आदमी का रहन-सहन भी बदल गया। उसका खानाबदोशी जीवन समाप्त हो गया था और उसने एक स्थान पर टिके रहने वाले किसान का जीवन शुरू कर दिया था। महत्वपूर्ण खोज थे।कृषि की शुरुआत तथा पशुओं को पालतू बनाना। 
  • उसने गेहूं, मक्का, जौ तथा सब्जियां उगाने की कला सीखी। 
  • पालतू पशुएं प्रतिदिन दूध देती थीं और जरूरत पड़ने पर उनमें से कुछ खाई भी जा सकती थीं। 
  • ये लोग गर्त वाले घरों का निर्माण और चाक से बने बर्तनों का प्रयोग भी करते थे। 
  • बड़ी-बड़ी शिलाओं के मकबरे और ऐसी कब्रें मिली हैं, जिनमें हड्डियां पात्रों में रखकर दबाई गई हैं। इस प्रकर की कब्रü चनल्लूर आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। इन्हें ‘डोलमेन’ कहा जाता है।
  • बेलन घाटी में विन्ध्य पर्वत के उत्तरी पृष्ठों पर लगातार तीनों अवस्थाएं एक के बाद एक पाई जाती हैं।पहले पुरापाषाण कालिक, तब मध्य-पाषाण कालिक और तब नव-पाषाण कालिक, और यही बात नर्मदा घाटी के मध्य-भाग की है।

 

  • क्वेटा संस्कृति से प्राप्त अवशेष धार्मिक विशेषताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।
  • समकालीन पश्चिमी एशियाई संस्कृति के अनुरूप ही कुछ लोग मातृदेवी की उपासना करते थे।
  • कुछ मुहरों में तीन सिर और एक सींगधारी पुरुष की आकृति खुदी हुई है। इतिहासकार इसे शिव के आद्यरूप पशुपति की आकृति मानते हैं।
  • हड़प्पा की एक मुहर में एक नग्न महिला की आकृति बनी हुई है जो कुछ नीचे की तरफ झुकी हुई है और मूर्ति की योनि से पौधा उत्पन्न दिखाई पड़ता है, जिससे भूदेवी की उपासना की प्रथा का परिचय मिलता है।
  • एक मूर्ति के सिर पर नाग की आकृति सर्पपूजा का प्रमाण देती है।
  • कालीबंगन में एक यज्ञ स्थल प्राप्त हुआ है।
  • योनि और लिंग जैसी अनेक पत्थर की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
  • कुछ मुद्राओं से पशुपति और वृक्ष पूजा की भी जानकारी मिलती है।
  • मृतकों के साथ गाड़ी जाने वाली दैनिक उपयोग की वस्तुओं से हड़प्पावासियों के पारलौकिक सत्ता में विश्वास का ज्ञान होता है।
  • चित्रित मृदभांडों से सिंधु सभ्यता के नागरिकों के मृदा-पात्रों के निर्माण की कुशलता ज्ञात होती है।
  • नगर योजना और जल-निष्कासन व्यवस्था के अनुरूप ही हड़प्पाकालीन पात्रों की उन्नातवस्था से एक तार्किक और सुव्यवस्थित मानसिकता का भान होता है।
  • हड़प्पा से प्राप्त बलुआ पत्थर की मानव शरीर को दर्शाने वाली दो मूर्तियों से सिंधु सभ्यता के नागरिकों की रूपंकर कला में उन्नति दृष्टिगत होती है।
  • इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से प्राप्त (संभवतया नर्तकी) मूर्ति की भाव-भंगिमायें धातु-मूर्तिकला का विकास दर्शाती हैं। खड़ी नग्न मूर्ति के गले में एक कंठाभूषण तराशा गया है और एक बाजू में पूरी तरह चूड़ियां तराशी गयी हैं। ऋग्वेद में उल्लिखित दासी की भाँति इस मूर्ति की नीग्रोइड आकृति बनाई गयी है।
  • बैल का काफी संख्या में अंकन और कई सिर वाले जंतुओं के चित्र इन जंतुओं के धार्मिक महत्व को स्थापित करते हैं।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त पुजारी की मूर्ति संपूर्ण मूर्तिकला में महत्वपूर्ण है। पुजारी की बारीकी से तराशी गयी दाढ़ी, मूछें, साफ और संवरे हुये बाल इस मूर्ति की कलात्मक विशेषता है। पूजारी की मूर्ति में अंकित बड़े-बड़े होठ और चैड़ी नाक से इसके दास होने का ज्ञान होता है।
  • हड़प्पाकालीन काष्ठकला और चित्रकला का एक भी उदाहरण प्राप्त नहीं हुआ है।

हड़प्पा संस्कृति का अन्त

  •     इस बात का अनुमान लगाना बहुत ही कठिन है कि हड़प्पा संस्कृति के विनाश का क्या कारण था।
  • भूकम्प, जमीन का अचानक उठाव, सिन्धु की बदलती परिस्थिति, मौसम परिवर्तन आदि कारणों का अनुमान इसके विनाश के सम्बन्ध में लगाया जा सकता है। मोहनजोदड़ो में प्राप्त मानव कंकालों में एक नरमंुड पाया गया जिस पर एक कटा निशान था। इससे बर्बर आक्रमण और सामूहिक हत्याकांड का अनुमान लगाया जाता है।
  • कुछ विद्वान इसके विनाश का कारण भयंकर बाढ़ को मानते हैं, क्योंकि बाढ़ से लाई गई ढेर सारी मिट्टी पायी गई।
  • लोथल में भी बाढ़ की भयानकता के चिन्ह देखे गये हैं।
  • कालीबंगन में बाढ़ या आक्रमण के कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए है। इस नगर के विनाश का कारण शायद घग्गर नदी का सूखना बताया जाता है।
  • कुछ नगरों का पतन स्थानीय कारणों के कारण भी हो सकता है।
  • सम्पूर्ण सभ्यता का अन्त अकस्मात ही नहीं हुआ था। हड़प्पा संस्कृति के पतन में लोथल और पंजाब का विनाश इस विचार की पुष्टि करता है।

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